मृच्छकटिक मंे नगरीय समाज का यथार्थ
डॉ0 अर्चना शर्मा
असिस्टेंट प्र¨फेसर, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
नगरीकरण प्राचीन भारतीय सामाजिक इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटना है। इसके फलस्वरूप अनेक परिवर्तन घटित हुए अ©र मान्य आदर्श तथा यथार्थ जीवन में व्यतिरेक दिखने लगा। धर्मशास्त्र्ा जहाँ आदर्श क¨ दृष्टि में रखकर विधिय¨ं का निर्माण करते हैं, वहीं ल©किक साहित्य की कुछ रचनाएँ सशक्तरूप से समाज के यथार्थ क¨ प्रस्तुत करती हैं। मृच्छकटिक इन विरल रचनाअ¨ं में से एक है। मृच्छकटिक एक प्रकरण है। निर्धारित मानक के अनुसार प्रकरण का इतिवृत्त कल्पित एवं ल¨काश्रित ह¨ता है। नायक, मंत्र्ाी, ब्राह्मण या वैश्य में से क¨ई एक ह¨ सकता है। नायक धीर प्रशान्त क¨टि का ह¨ता है तथा विघ्न¨ं से युक्त ह¨ता है। प्रकरण की नायिका कुलस्त्र्ाी या वेश्या ह¨ती है। कहीं-कहीं द¨न¨ं नायिकायें ह¨ती हैं।1 यह समस्त लक्षण मृच्छकटिक पर चरितार्थ ह¨ता है।
प्रकरण का इतिवृत्त काल्पनिक ह¨ता है इससे यह नहीं समझना चाहिए कि वह सत्य से, यथार्थ से बहुत दूर है। सत्य कटु ह¨ता है। कानून आक्ष्¨प-प्रत्याक्ष्¨प के लिए प्रमाण की अपेक्षा रखता है, इससे बचने के लिए रचनाकार ‘कल्पित’ के आवरण में समाज के यथार्थ क¨ प्रकाशित करता है। मृच्छकटिक क¨ प्रायः गुप्तकालीन रचना माना जाता है।2 इसकी घटनाअ¨ं का स्थल प्रसिद्ध नगर उज्जयिनी है। इसके इतिवृत्त का आधार भासकृत रूपक ‘चारुदत्त’ है जिसे ‘दरिद्रचारुदत्त’ भी कहा जाता है। भास की यह कृति केवल चार अंक¨ं की है जबकि शूद्रक का मृच्छकटिक दस अंक¨ं का रूपक है। भास की कथा का मुख्य आधार चारुदत्त अ©र बसन्तसेना का प्रेम प्रसंग है।
शूद्रक ने इस प्रसंग क¨ अ©र आगे बढ़ाते हुए चारुदत्त के पुत्र्ा र¨हसेन द्वारा स्वर्ण शकट की मांग, निदर्¨ष चारुदत्त क¨ मृत्युदण्ड, भ्रष्ट राजा के विरूद्ध आभीर युवक आर्यक का विद्र¨ह, आदि झलकिय¨ं के माध्यम से अपने युग के समाज के यथार्थ क¨ प्रस्तुत किया है।
मृच्छकटिक के समाज में चातुवण्र्य व्यवस्था अस्तित्त्वमान त¨ थी किन्तु वर्णधर्म का सिद्धान्त परिवर्तित एवं शिथिल ह¨ चुका था। धर्मशास्त्र्ाकार¨ं ने आपद् धर्म की आड़ में ब्राह्मण¨ं के लिए क्षात्र्ा या वैश्य कर्म करने की ज¨ बात कही वह यहाँ सामान्य बात ह¨ गयी थी। प्रकरण का नायक चारुदत्त ब्राह्मण था, किन्तु उसकी ख्याति सार्थवाह के रूप में थी। वैश्यवृत्ति पीढ़िय¨ं से उसके परिवार का मुख्य व्यवसाय था जिससे उसके पूर्वज¨ं ने अकूत संपत्ति अर्जित की थी। चारुदत्त का व्यापार भी कभी उन्नत अवस्था में था, किन्तु दानादि में संलिप्त ह¨कर वह निर्धन ह¨ गया।3 निर्धन ह¨ने पर भी वह गुणवान एवं श्रेष्ठ ब्राह्मण के रूप में सम्मानित था। मैत्र्¨य मूर्ख की तरह तथा शर्विलक च©र कला में पारंगत ब्राह्मण थे।4 शर्विलक यज्ञ¨पवीत क¨ च¨री में प्रयुक्त ह¨ने वाली उपय¨गी वस्तु के रूप में वर्णित करता है।5 वह नायिका बसन्तसेना की क्रीतदासी से प्रेम करता एवं उसे मुक्त कराने हेतु चारुदत्त के घर च¨री करता है। वह च¨री क¨ एक व्यवसाय के रूप में प्रस्तुत करता है तथा च¨री की आदर्श आचार संहिता की चर्चा करता है।6 इस प्रकार मृच्छकटिक में वर्णित समाज में अनेक प्रकार के ब्राह्मण¨ं का अस्तित्त्व दिखाई देता है।7 वैश्य वर्ण की स्थिति अच्छी प्रतीत ह¨ती है। व्यापारी व्यापार के क्रम में विदेश की यात्र्ाा करते रहते थ्¨।8 शूद्र राज्य में महत्त्वपूर्ण पद¨ं पर आसीन थ्¨। चन्दनक अ©र वीरक इसके उदाहरण थ्¨।9
मृच्छकटिक के समाज में अनेक जातिय¨ं तथा व्यवसाय¨ं का अस्तित्त्व दिखाई देता है। आर्यक आभीर जाति का युवक है ज¨ आभीर¨ं की बस्ति में रहता तथा ज्य¨तिषी उसे राजसत्ता प्राप्त ह¨ने की भविष्यवाणी करते हैं।10 राजा उस पर अत्याचार करता है अ©र वह विद्र¨ही बन जाता है। संवाहक पाटलिपुत्र्ा के सद्गृहस्थ का पुत्र्ा है तथा चारुदत्त के संवाहक (मालिश करने का) का कार्य करता है। चारुदत्त के निर्धन ह¨ जाने पर द्यूतक्रीड़ा से अपनी जीविका चलाता है। जुएं में हारने तथा बसन्तसेना के सहय¨ग से उपकृत (ऋणमुक्त) ह¨ने के बाद वह ब©द्ध भिक्षु बन जाता है।11 कुछ वर्ण संकर एवं निम्न जातिय¨ं की सूचना भी मिलती है। मृच्छकटिक में चाण्डाल¨ं का उल्ल्¨ख आता है ज¨ वधिक का कार्य करते हैं। मृच्छकटिक में चाण्डाल¨ं के चरित्र्ा का अत्यन्त उत्कृष्ट वर्णन है। वह निदर्¨ष का वध करने में हिचकिचाते हैं तथा दुष्ट राजा के शासन एवं न्याय की आल¨चना करते हैं।12
पत्नियाँ विवाहेतर सम्बन्ध क¨ भी स्वीकार कर ल्¨ती थीं अ©र पतिव्रता धर्म का पालन करती थीं। समाज में बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन था। चारुदत्त विवाहित ह¨ने के पश्चात् भी गणिका बसन्तसेना से विवाह करता है।13 राजा अनेक रानिय¨ं के पश्चात् भी रख्©ल रखता है। चारुदत्त की पत्नी द्यूता पतिव्रता आदर्श की प्रतिमूर्ति है।14 बसन्तसेना के धर¨हर रूपी आभूषण¨ं के च¨री ह¨ जाने उसके बदल्¨ वह अपनी हजार मणिय¨ं की रत्नावली मैत्र्¨य एवं चारुदत्त के माध्यम से बसन्तसेना के पास भेजती है।15 बसन्तसेना के साथ बहन जैसा व्यवहार करती है। निदर्¨ष पति क¨ मृत्युदण्ड सुनाये जाने पर सती ह¨ने की तैयारी करती है।16 चारुदत्त के पुत्र्ा र¨हसेन द्वारा मृच्छकटिक के स्थान पर स्वर्ण शकट की मांग प्रस्तुत कर, ल्¨खक ने बच्चे के मानसिक भावना की यथार्थ अभिव्यक्ति की है।
नगर¨ं की अवश्यकता के अनुरूप मृच्छकटिक में गणिका वर्ग के अस्तित्त्व की सूचना भी प्राप्त ह¨ती है। नायिका बसन्तसेना गणिकावृत्ति से सम्बन्धित है। इस वर्ग का मुख्य व्यवसाय मन¨रंजन एवं कलाअ¨ं से संबंधित था। कामसूत्र्ा ने गणिका क¨ वह वेश्या कहा है ज¨ च©सठ कलाअ¨ं में पारंगत ह¨।17 मृच्छकटिक में बसन्तसेना का अत्यन्त उत्कृष्ट चरित्र्ा का विवरण प्राप्त ह¨ता है। वह समस्त वैभव¨ं से युक्त शकार की उपेक्षा कर निर्धन चारुदत्त से प्रेम करती है।18 दास¨ं के प्रति करुणा का भाव रखती है। चारुदत्त के पत्नी एवं पुत्र्ा के विषय में सतर्क एवं सहय¨गी दिखाई देती है। ऋणी जुआड़ी क¨ चारुदत्त का सेवक जानकर ऋणमुक्त करने हेतु अपना स्वर्ण कंगन देती है।19 बसन्तसेना की माता भी गणिका थी। न्यायालय ने चारुदत्त क¨ मृत्युदंड से मुक्त करने की बात करती है, ज¨ उसकी गहन संवेदनशीलता का प्रतीक है।
उपर्युक्त वर्ग के अतिरिक्त एक अन्य वर्ग दास¨ं का था। राजाअ¨ं, व्यापारिय¨ं, गणिकाअ¨ं के यहाँ दास¨ं की उपस्थिति की सूचना मिलती है। मृच्छकटिक के स्थावरक अ©र मदनिका नामक दास¨ं के संदर्भ से ऐसा लगता है कि दास¨ं से अच्छा व्यवहार करना या न करना मालिक¨ं के स्वभाव पर निर्भर करता था। मदनिका की मालकिन गणिका बसन्तसेना उसे अपनी सखी के समान समझती है अ©र इस क्रीतदासी क¨ सांकेतिक धन ल्¨कर मुक्त कर देती है20, जबकि स्थावरक का मालिक क्रूर, विलासी एवं मूर्ख शकार है ज¨ राजा का साला है। वह उसे तब मुक्त नहीं करता जब राजसत्ता परिवर्तित नहीं ह¨ जाती है।21 धर्मशास्त्र्ा¨ं में वर्णित दास¨ं की क¨टिय¨ं में से क्रीत एवं स्वविक्रीत दास¨ं के उदाहरण मृच्छकटिक में प्राप्त ह¨ते हैं।22 धर्मशास्त्र्ाीय नियम¨ं के अनुसार दास न्यायप्रक्रिया में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं ह¨ सकते। इस विषय में मृच्छकटिक में एक द्वन्द्व की स्थिति दिखाई देती है।23
मृच्छकटिक में वर्णित प्रशासनतंत्र्ा भ्रष्ट एवं अल¨कप्रिय था। धर्मशास्त्र्ा¨ं में राजा से आशा की जाती थी कि वह ल¨क कल्याण का ध्यान रख्¨ं तथा य¨ग्य, ईमानदार एवं निष्पक्ष अधिकारिय¨ं का चयन करें। मृच्छकटिक का राजा पालक पक्षपाती, अल¨कप्रिय, दुश्चरित्र्ा एवं अन्यायी था। उसके रख्©ल के भाई शकार की प्रशासन पर पकड़ थी। न्यायालय का अधिकारी अधिकरणिक शकार के प्रभाव में तथा स्थानान्तरण के भय से निदर्¨ष क¨ सजा सुनाता है।24 न्यायालय के अन्य अधिकारी श¨धनक एवं कायस्थ थ्¨। ज¨ न्यायाधीश के आदेशानुसार कायर्¨ं क¨ करते थ्¨ इसीलिए जनता में अल¨कप्रिय थ्¨। कायस्थ की तुलना सर्प से की गयी है।25 समस्त न्याय प्रक्रिया आदर्श एवं यथार्थ के द्वन्द्व से जूझती दिखाई देती है। धर्मशास्त्र्ाीय विधान ब्राह्मण अवध्य है के अनुकूल न्यायाधीश निर्णय देता है किन्तु राजा उसे मृत्युदण्ड में परिवर्तित कर देता है।26 इस प्रकार राजा का सम्पूर्ण प्रशासन विफल था सामान्य जन सायंकाल से ही नगर के मागर्¨ं पर जाने से बचते थ्¨। उन पर वेश्या, विट, चेर अ©र सिपाही ही घूम सकते थ्¨।27
यद्यपि नगर कला एवं शिक्षा का केन्द्र था, फिर भी समाज में अनेक विषमतायें म©जूद थी। आर्थिक असमानता, अन्धविश्वास आदि का वर्चस्व था। नगर में जहाँ एक अ¨र धनाढ्य¨ं के परिवार थ्¨ जिनके बच्चे स्वर्ण शकट से ख्¨ला करते थ्¨ तथा नगर की प्रमुख गणिका का भवन रत्न जड़ित था, वहीं दूसरी अ¨र च¨र¨ं अ©र सेंधमार¨ं के विषय में भी जानकारी मिलती है। अपनी गरीबी एवं ऋण से परेशान ह¨कर संवाहक द्वारा ब©द्ध भिक्षु के रूप में प्रव्रज्या ल्¨ने का उल्ल्¨ख प्राप्त ह¨ता है।28 चारुदत्त निर्धन है। दीये में जलाने के लिए उसके पास तेल नहीं है29 किन्तु उसके पास एक बड़ा आवास है। घर के अल्प सामान¨ं में मृदंग, पणव, बर्दुर (बांसुरी), वीणा, वंश (बीन) तथा पाण्डुलिपियाँ रखी है।30 वह सुगन्धित ऊध्र्ववस्त्र्ा पहनता है। संगीत की ग¨ष्ठिय¨ं में जाता है। अपनी प्रेयसी गणिका बसन्त सेना क¨ उपवन में बुलाने हेतु ढ़की गाड़ी भेजता है। इससे ऐसा लगता है कि उसकी निर्धनता सापेक्षित थी। चूंकि वह महाजन¨ं के मुहल्ल्¨ में रहता था, जहाँ धनाढ्य महाजन¨ं के बच्च¨ं क¨ स्वर्ण शकट से ख्¨लता देख चारुदत्त का पुत्र्ा मृत शकट से ख्¨लने से इंकार कर देता है।31 नगर में आबादी अधिक थी। नगर के मागर्¨ं पर गाड़िय¨ं का जाम लगा रहता था।32 सामान्य जन के साथ-साथ पढ़े लिख्¨ ल¨ग भी अन्धविश्वास¨ं की चर्चा करते थ्¨। ब्राह्मण चारुदत्त एवं बसन्तसेना द्वारा स्थान-स्थान पर अनेक शुभ-अशुभ संकेत¨ं की चर्चा की गई है। चाण्डाल वध के अवसर पर तलवार गिर जाने क¨ शुभ लक्षण मानता है अ©र भगवती सहयवासिनी क¨ प्रसन्न ह¨कर चाण्डाल कुल क¨ अनुग्रहीत करने की प्रार्थना करता है।33
उपर¨क्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि नगर जीवन में आदर्श एवं यथार्थ का द्वन्द्व दिखाई देता है। चूंकि व्यवहारिकता सर्वथा अधिक व्यापक ह¨ती है इसीलिए आदर्श की शिथिलता दिखाई देती है। नगर में पढ़े-लिख्¨ ल¨ग थ्¨, इसलिए आदर्श पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ था। पढ़े-लिख्¨ ल¨ग शास्त्र्ा की बात करते थ्¨ किन्तु प्राधान्य व्यवहार का था। जहाँ अ©र जब भी आदर्श अ©र यथार्थ का द्वन्द्व उपस्थित ह¨ता है सामान्य जन द¨न¨ं क¨ देखता है। वह अधिक जागरूक ह¨ जाता है। मृच्छकटिक में हम देखते हैं कि वधिक (चाण्डाल), ब©द्ध भिक्षु, बसन्तसेना की माता (गणिका), विदूषक, गाड़ीवान आदि न्याय की बात करते हैं। शकार बसन्तसेना पर आसक्त है अ©र गलती से गाड़िय¨ं की अदल-बदल के कारण चारुदत्त के स्थान शकार के पास पहुँच जाती है। वहाँ भी चारुदत्त के प्रति बसन्तसेना के समर्पण अ©र सम्मान भाव क¨ देखकर शकार उसका गला दबा देता है अ©र मृत जानकर हत्या का अभिय¨ग चारुदत्त पर लगाता है। एक ही दिन अनेक साक्ष्य प्रस्तुत किये जाते तथा अधिकरणिक (न्यायाधीश) के द्वारा निर्णय दे दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सामान्य जन की भूमिका न्यायालय में बहुत महत्त्वपूर्ण ह¨ती है। शकार के अलावा क¨ई भी व्यक्ति चारुदत्त के विरुद्ध गवाही नहीं देता। बसन्तसेना की मां ज¨ स्वयं भी गणिका थी निदर्¨ष चारुदत्त क¨ बचाने के लिए कहती है- यह त¨ वादी-प्रतिवादी का व्यवहार है, बेटी मेरी मारी गई है, वादिनी मैं हूँ अ©र मैं चारुदत्त क¨ छ¨ड़ देने के लिए कह रही हूँ। विदूषक शकार क¨ अपशब्द कहता है (काण्¨लीसुदा, कुट्टिणिपुत्ता) तथा दण्ड से शकार पर प्रहार करता है। गाड़ीवान स्थावरक ज¨ शकार का दास भी है- दण्डस्थल पर उपस्थित ह¨कर चारुदत्त क¨ निदर्¨ष अ©र शकार क¨ हत्यारा बताता है। चाण्डाल चारुदत्त क¨ वध के लिए ल्¨ जाते समय अत्यन्त दुःखी ह¨ते हैं अ©र भीड़ से अपील करते हैं कि सज्जन¨ं का वध देखना अनुचित है। तथा चारुदत्त क¨ उज्जैन का आभूषण बताते हैं।
मृच्छकटिक का ल्¨खक विविध प्रकार से यथार्थ क¨ प्रतिबिम्बित करता है किन्तु आदर्श क¨ भूल नहीं जाता। कभी-कभी स्थान भेद से विपयर्य दिखाने का भी प्रयास करता है। जहाँ एक अ¨र वह राजा की तुच्छता क¨ उजागर करता है वहीं गणिका क¨, जिसकी साहित्य में छ¨टेपन की चर्चा की जाती है, आदर्श रूप में प्रस्तुत करता है। यह गणिका बसन्तसेना है अ©र मृच्छकटिक की नायिका है। गणिका के प्रति भी मृच्छकटिक द¨ तरह के दृष्टिक¨ण प्रस्तुत करता है। राजा रख्©ल रखता है, चारुदत्त के लिए बसन्तसेना केवल गणिका नहीं एक सम्मानित स्त्र्ाी है वह उससे विवाह करता है। चारुदत्त के माध्यम से मृच्छकटिककार स्त्र्ािय¨ं के प्रति उदात्त एवं आदर्श भावना क¨ व्यक्त करता है। संक्ष्¨प में मृच्छकटिक का प्रतिपाद्य मात्र्ा यथार्थ नहीं है, आदर्श एवं यथार्थ का द्वन्द्व है।
संदर्भ:
1. दशरूपक- धनज॰यकृत व्याख्याकार- ल¨कमणि दहाल, वाराणसी, 3/39-40, 1987
अथ प्रकरण्¨ वृत्तमुत्पाद्य ल¨कसंश्रयम्।
अमात्य-विप्रवणिजामेकं कुर्याच्च नायकम्।।
धीर प्रशान्तं सापायं धर्म कामार्थ तत्परम्।
श्¨षं नाटकवत् सन्धि-प्रवेशक-रसादिकम्।।
इसी प्रकार का विवरण ‘साहित्यदर्पण’ में भी प्राप्त ह¨ता है-
‘भवेत् प्रकरण्¨ वृत्तं ल©किकं कविकल्पितम्।
शृ¯ार¨ऽ¯ी नायकस्तु विप्र¨ऽमात्य¨ऽथवा वणिक्।।
सापायधर्मकामार्थपर¨ धीरप्रशान्तकः।
नायिका कुलजा क्वापि, वेश्या, क्वापि द्वयं क्वचित्।।
तेन भेदास्त्र्ायस्तस्य तत्र्ा भेदस्तृतीयकः।
कितवद्यूतकारादि-विट-चेटक-संकुलः।। (6/241-43)
2. गुप्त, परमेश्वरीलाल, गुप्त साम्राज्य, वाराणसी, 2011 (तृतीय संस्करण), पृ0 543
3. महाकविशूद्रककविप्रणीतं मृच्छकटिकम्, व्याख्याकार- आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र, वाराणसी 2012, पृ0 67, पृ0 456
4. पृ0 146-147, वही, पृ0 160, वही, पृ0 168
5. मृच्छकटिकम्, पृ0 155
यज्ञ¨पवीत से सेंध काटते समय भीत मापी जाती है। इसकी मदद से पहने हुए जेवर¨ं की हुक ख¨ली जाती है। इसकी सहायता से कसकर लगाई गई किवाड़¨ं की किल्ली आसानी से खुल जाती है। जहरील्¨ कीड़े या सांप¨ं के काटने पर इससे मजबूत गांठ लगाई जाती है।
6. वही, पृ0 160-62, पृ0 185, 193-202
7. काण्¨, पी0वी0, धर्मशास्त्र्ा का इतिहास, प्रथम भाग, लखनऊ, 1992, चतुर्थ संस्करण, पृ0 153, धर्मशास्त्र्ाकार¨ं ने ब्राह्मण¨ं क¨ वृत्तिय¨ं के आधार पर कई भाग¨ं में बाँटा है। अत्र्ाि (373-383) ने ब्राह्मण¨ं के दस प्रकार बताये हैं- (1) देव ब्राह्मण, (2) मुनि ब्राह्मण, (3) द्विज ब्राह्मण, (4) क्षत्र्ा ब्राह्मण, (5) वैश्य ब्राह्मण, (6) शूद्र ब्राह्मण, (7) निषाद ब्राह्मण, (8) पशु ब्राह्मण, (9) म्ल्¨च्छ ब्राह्मण, (10) चाण्डाल ब्राह्मण। अपरार्क ने देवल क¨ उद्धृत करते हुए ब्राह्मण¨ं क¨ आठ प्रकार¨ं में बाँटा है- (1) जाति ब्राह्मण, (2) ब्राह्मण, (3) श्र¨त्र्ािय, (4) अनूचान, (5) भ्रूण, (6) ऋषिकल्प, (7) ऋषि, (8) मुनि। चारुदत्त क¨ हम अत्र्ाि द्वारा बताये गये ब्राह्मण¨ं की दस क¨टिय¨ं में से वैश्य ब्राह्मण की क¨टि में रख सकते थ्¨ जबकि मैत्र्¨य अ©र शर्विलक क¨ अत्र्ाि द्वारा बताये गये पशु ब्राह्मण एवं देवल द्वारा बताये गये जाति ब्राह्मण की क¨टि में रख सकते हैं ज¨ नाममात्र्ा के ब्राह्मण थ्¨। सामाजिक यथार्थ क¨ देखकर ही अत्र्ाि ने इस प्रकार व्यवस्था दी ह¨गी।
8. मृच्छकटिक, पूवर्¨क्त संस्करण, पृ0 93, उवारूडसिण्¨हं पि पणइजणं परिच्चइअ देसंतरगमण्¨ण वाणिअजण¨ महन्तं विअ¨अजं दुक्खं उजादेदि।
9. वही, पृ0 318-20, सेनापति वीरक नापित था अ©र बलाधिपति चन्दनक चमार था।
10. वही, पृ0 208 (ग¨पालदारक¨ राजा भविष्यति..........पालकेन राज्ञा घ¨षादानीय घ¨रे बन्धनगारे बद्धः तथा पृ0 305
11. वही, पृ0 121-130
12. वही, पृ0 471-486, दशवें अंक में एक स्थल पर चाण्डाल कहता है कि चाण्डाल कुल में जन्म ल्¨कर भी हम ल¨ग चाण्डाल नहीं हैं, असली चाण्डाल त¨ वे हैं ज¨ अकारण सज्जन¨ं क¨ सताते हैं; वे ही पापकर्मी हैं।
13. वही, पृ0 542
14. वही, पृ0 535; आर0सी0 मजूमदार एवं ए0डी0 पुसलकर (संपा0), श्रेण्ययुग, दिल्ली, 1984, पृ0 631
15. वही, पृ0 174-178
16. वही, पृ0 533-540; यहाँ विदूषक मैत्र्¨य एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात कहता है कि आप जैसी ब्राह्मणिय¨ं क¨ पति से अलग चिता की अग्नि में प्रवेश क¨ ऋषिय¨ं ने पाप कहा है। संभवतः उसका संकेत उन धर्मशास्त्र्ाकार¨ं की अ¨र था ज¨ ब्राह्मण विधवा के लिए सती ह¨ना वर्जित मानते थ्¨। किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं था। रामायण में (उत्तरकाण्ड 17/15) एक ब्राह्मणी के सती ह¨ जाने की अ¨र संकेत है। काण्¨, पी0वी0, धर्मशास्त्र्ा का इतिहास, प्रथम भाग, लखनऊ, 1992, चतुर्थ संस्करण, पृ0 349। संभवत इसीलिए चारुदत्त की पत्नी धूता कहती है कि पति के अमंगल सुनने की अपेक्षा यह पाप करना अच्छा है।
17. कामसूत्र्ा 1/3/20, उधृत पी0वी0 काण्¨, धर्मशास्त्र्ा का इतिहास, प्रथम भाग, लखनऊ, 1992 (चतुर्थ संस्करण), पृ0 354; दशकुमारचरित में राग मंजरी एवं काममंजरी नामक गणिकाअ¨ं का विवरण मिलता है तथा गणिका की शिक्षा-दीक्षा की भी विस्तृत जानकारी मिलती है, उधृत आर0सी0 मजूमदार एवं ए0डी0 पुसलकर (संपा0), श्रेण्ययुग, दिल्ली, 1984, पृ0 635
18. मृच्छकटिक, पूवर्¨क्त संस्करण, पृ0 95; जब बसन्तसेना अपने प्रेमी चारुदत्त का परिचय देती है त¨ उसकी दासी मदनिका चारुदत्त क¨ दरिद्र कहती है त¨ बसन्तसेना का कथन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ह¨ता है कि ‘गरीब से प्रेम करने वाली गणिका बदनाम नहीं ह¨ती है।’
19. मृच्छकटिक, पूवर्¨क्त संस्करण, पृ0 128 (तस्स कारणाद¨ अज्जआ इमं हत्थाभरणं पडिवादेदि)।
20. वही, पृ0 188-205
21. वही, पृ0 543
22. मदनिका क्रीत दासी है अ©र संवाहक स्वयं क¨ 10 स्वर्णमुद्राअ¨ं में बेचने का प्रयास करता है।
23. मृच्छकटिक, पूवर्¨क्त संस्करण, पृ0 498
24. वही, पृ0 419-466; राजा के साल्¨ का उल्ल्¨ख कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् में भी आता है जिसका नाम श्यामलः था जिसे दुष्यन्तस्य श्यालः अ©र प्रधान राजपुरुष (क¨तवाल) कहा गया है। यह प्राकृत ब¨लता है। चतुर्वेदी, पं0 सीताराम, कालिदास ग्रन्थावली, लखनऊ, 2063 (विक्रमाब्द), पृ0 89-93
25. वही, पृ0 435
26. मृच्छकटिक, 466-467, काण्¨, पी0वी0, धर्मशास्त्र्ा का इतिहास, भाग-1, लखनऊ, 1992 (चतुर्थ संस्करण), पृ0 157, कदाचित ऐसी बदली परिस्थितियों में कात्यायन आदि जैसे कुछ धर्मशास्त्र्ाकार¨ं ने ब्राह्मण क¨ भी मृत्युदण्ड देने की व्यवस्था की ह¨ जबकि अधिकांश धर्मशास्त्र्ाकार ब्राह्मण क¨ अवध्य मानते हैं। ग©तम त¨ ब्राह्मण क¨ अवध्य, अवन्ध्य, अदण्ड्य, अबहिष्कार्य, अपरिवाद्य एवं अपरिहार्य मानते हैं।
27. मृच्छकटिकम, पृ0 32, एतस्यां, प्रद¨षबेलायाम् इह राजमार्गे गणिका विटाश्चेटा राजबल्लभाश्च पुरुषाः स॰चरन्ति।
28. वही, पृ0 130, तत् संवाहक¨ द्यूतकरः शाक्यश्रमणकः संवृत इति स्मत्र्तत्यानि आर्यमा एतानि अक्षराणि।
29. वही, पृ0 87
30. वही, पृ0 158
31. वही, पृ0 213, 291, चारुदत्त की दासी रदनिका बसन्तसेना क¨ चारुदत्त के बेटे र¨हसेन के र¨ने का कारण बताती है कि यह कहता है कि मुझे मिट्टी की गाड़ी नहीं स¨ने की गाड़ी ही चाहिए- मम एदाए मट्टिआ-सअडिआए, तं ज्जेब स¨वण्ण-सअडिअं देहि’ति।
32. वही, पृ0 370
33. बसन्तसेना- गाड़ीवान की बदली आवाज क¨ सुनकर दाहिनी आंख फड़कने की बात करती है, पृ0 356। चारुदत्त बसन्तसेना क¨ उपवन में न देखकर बायीं आंख फड़कने की चर्चा करता है, पृ0 337 अ©र चाण्डालांे द्वारा शुभ-अशुभ की चर्चा भी की जाती है, पृ0 513
Received on 09.12.2014 Modified on 16.12.2014
Accepted on 28.12.2014 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 2(4): Oct. - Dec. 2014; Page 208-211